

विनाशकारी 7.7 तीव्रता के भूकंप के बाद म्यांमार में त्राहि-त्राहि मची हुई है। 1,600 से अधिक लोगों की मौत और 3,400 घायल — ये आपदा न केवल प्रकृति की ताकत का प्रदर्शन है बल्कि तैयारी की कमी की भारी कीमत का भी प्रमाण है। जैसे ही मांडले और नैपीडॉ जैसे शहर अंधेरे में डूबे और इमारतें मलबे में तब्दील हुईं, पूरी दुनिया प्रतिक्रिया दे रही है। लेकिन इस भूकंप से आगे एक गहरा सबक छिपा है — जो केवल फॉल्ट लाइनों या प्लेट्स के टकराव से कहीं बड़ा है।
म्यांमार चार प्रमुख टेक्टोनिक प्लेट्स — यूरेशियन, इंडियन, सुंडा और बर्मा माइक्रोप्लेट — के संगम पर स्थित है। इस भूगर्भीय स्थिति के कारण यह क्षेत्र भूकंपों के प्रति अत्यधिक संवेदनशील है। सगाइंग फॉल्ट, जो म्यांमार का सबसे सक्रिय फॉल्ट है, ने 1900 के बाद से 6-8 बड़े भूकंप उत्पन्न किए हैं, ये आंकड़ा यूएस जियोलॉजिकल सर्वे द्वारा साझा किया गया है।
इस बार का भूकंप केवल तीव्रता की वजह से नहीं, बल्कि इसके द्वारा शहरी बुनियादी ढांचे को पहुंचे नुकसान के कारण भी चिंताजनक है। अस्पतालों में जगह नहीं, लोग सड़कों पर रात बिता रहे हैं — ये प्राकृतिक घटना नहीं, बल्कि एक राष्ट्रीय आपदा में तब्दील परीक्षा थी।
और पढ़ें: म्यांमार की विवर्तनिक संवेदनशीलता और भूकंपीय जोखिम के बारे में।
भारत, चीन और थाईलैंड जैसे पड़ोसी देशों ने तेजी से मानवीय सहायता भेजी। भारतीय वायुसेना ने नैपीडॉ तक कई उड़ानें भरीं, राहत सामग्री और रेस्क्यू टीमें लेकर। चीन की टीमें, जिनमें युन्नान से आई ज़मीनी इकाइयाँ भी शामिल थीं, सबसे पहले म्यांमार पहुँचीं।
थाईलैंड में भी प्रभाव महसूस किया गया — 1000 किमी दूर होने के बावजूद एक निर्माणाधीन गगनचुंबी इमारत ढह गई, जो ये दिखाता है कि भूकंप सीमाएं नहीं मानते।
जानें: भारत, चीन और थाईलैंड कैसे म्यांमार के भूकंप पीड़ितों की मदद कर रहे हैं।
2021 की सैन्य तख्तापलट के बाद से म्यांमार में राजनीतिक अस्थिरता बनी हुई है। शासन, इन्फ्रास्ट्रक्चर नियमन, शहरी योजना और भवन कोड जैसे अहम मुद्दों को नजरअंदाज किया गया है। किसी स्थिर शासन वाले देश में, भूकंप-प्रतिरोधी इमारतें और अच्छी आपातकालीन तैयारी सैकड़ों जानें बचा सकती थीं।
यह आपदा एक कड़वा सच उजागर करती है: भूकंप लोगों को नहीं मारते — कमजोर इमारतें मारती हैं। तैयारियों की कमी और मानकों के पालन में ढिलाई ने इस प्राकृतिक घटना को मानव निर्मित तबाही बना दिया।
और पढ़ें: कैसे म्यांमार का राजनीतिक संकट आपदा प्रतिरोध को कमजोर कर रहा है।
भविष्यवाणी करना भले ही विज्ञान की सीमा से बाहर हो, लेकिन जोखिम आकलन और संरचनात्मक तैयारी आज के समय में संभव हैं। हमें पता है कि भूकंप कहां आ सकते हैं। हमें ये भी पता है कि कैसे सुरक्षित शहर बनाए जा सकते हैं। समस्या ज्ञान की नहीं है, समस्या है उसके क्रियान्वयन की।
जापान और चिली जैसे देश जो भूकंपीय रूप से संवेदनशील हैं, उन्होंने मजबूत निर्माण व आपदा प्रबंधन में निवेश करके हजारों जानें बचाई हैं। म्यांमार को अब राजनीतिक इच्छाशक्ति, वैश्विक निवेश और ठोस शासन सुधारों की आवश्यकता है।
खोजें: जापान की भूकंप-प्रतिरोधी नीतियाँ कैसे जीवन बचाती हैं।
विनाश के बीच, एक नाजुक उम्मीद की किरण है। वर्तमान संघर्ष विराम म्यांमार के लिए एक महत्वपूर्ण अवसर हो सकता है। एक स्थिर राजनीतिक माहौल निवेश, विशेषज्ञता और नियामक सुधार को आकर्षित कर सकता है — ये सभी भविष्य में सुरक्षित म्यांमार की नींव डाल सकते हैं।
यह केवल पुनर्निर्माण की बात नहीं है, यह बात है भविष्य को आपदाओं से सुरक्षित बनाने की। यदि अभी निर्णायक कदम उठाए गए, तो यह त्रासदी एक निर्णायक मोड़ बन सकती है।
म्यांमार में 7.7 तीव्रता के भूकंप ने तबाही मचाई और मौतों का आंकड़ा लगातार बढ़ रहा है।
यह देश चार प्रमुख टेक्टोनिक प्लेट्स के संगम पर है।
भारत, चीन और थाईलैंड ने तेजी से मानवीय सहायता भेजी।
राजनीतिक अस्थिरता ने आपदा प्रबंधन को कमजोर किया है।
भूकंप-प्रतिरोधी निर्माण और शासन सुधार जरूरी हैं।
संघर्ष विराम भविष्य की तैयारी का एक अवसर प्रदान करता है।
प्राकृतिक आपदाएं होती रहेंगी। लेकिन वे राष्ट्रीय त्रासदी बनेंगी या केवल खबर की हेडलाइन, यह पूरी तरह हमारी तैयारी पर निर्भर करता है। म्यांमार का यह भूकंप एक चेतावनी है कि जब राजनीति, नीतियों से ऊपर हो जाती है, तब जनजीवन संकट में आ जाता है।
आइए, यह घटना केवल दुख की कहानी न बने, बल्कि परिवर्तन, मजबूती और वैश्विक सहयोग का आधार बने।
यदि यह लेख आपके लिए उपयोगी रहा हो, तो इसे साझा करें और हमारे ब्लॉग को फॉलो करें ताकि आप आपदा प्रबंधन, भू-राजनीति और जलवायु लचीलापन जैसे महत्वपूर्ण विषयों से जुड़े रहें।
नवीनतम समाचार प्राप्त करें: म्यांमार भूकंप और इसके प्रभाव के बारे में।
#MyanmarEarthquake2025 #DisasterPreparedness #TectonicPlates #AsiaCrisis #GlobalAid #SagaingFault #MyanmarPolitics #ResilientCities #QuakeLessons
कॉपीराइट 2022 ओजांक फाउंडेशन