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भारत के वैज्ञानिक प्रकाशनों की गुणवत्ता पर संकट

28-03-2025

🧠 भारत के वैज्ञानिक प्रकाशन: मात्रात्मक दौड़, गुणवत्ता का संकट
 

भारत वैश्विक वैज्ञानिक उत्पादन में अग्रणी बनने की होड़ में है। दावा है कि 2029 तक भारत अमेरिका से अधिक शोध प्रकाशन करेगा। यह सुनकर गर्व हो सकता है, लेकिन अगर आप गहराई से देखें, तो यह स्थिति केवल भ्रामक नहीं, बल्कि चिंताजनक है।

संख्या में वृद्धि के बावजूद, भारत के वैज्ञानिक शोध की गुणवत्ता गंभीर सवालों के घेरे में है। चुनौती केवल और अधिक शोध पत्र छापने की नहीं है, बल्कि गुणवत्ता युक्त, नैतिक और प्रभावशाली शोध तैयार करने की है जो वैश्विक मानकों पर खरे उतरें।

 

🌐 पढ़ें: भारत का वैज्ञानिक शोध: मात्रा बनाम गुणवत्ताNature का लेख, जिसमें भारत के बढ़ते वैज्ञानिक प्रकाशनों और गुणवत्ता संबंधी चिंताओं का विश्लेषण किया गया है।

 



📊 आंकड़ों का खेल: भ्रम बनाम सच्चाई
 

हाल ही में राष्ट्रीय विज्ञान दिवस पर एक कार्यक्रम में विज्ञान मंत्री ने दावा किया कि भारत अमेरिका को प्रकाशनों की संख्या में पीछे छोड़ने के करीब है। 2024 में भारत के पास 2,07,390 शोध पत्र थे, जबकि अमेरिका के पास 4,57,335। चीन 8,98,949 प्रकाशनों के साथ सबसे आगे है।

लेकिन ध्यान रहे: मात्रा कभी भी गुणवत्ता की गारंटी नहीं होती।
 

🔍 CNCI — असली गुणवत्ता सूचक

Category Normalized Citation Impact (CNCI) से सच्ची तस्वीर सामने आती है:

  • भारत: 0.879

  • चीन: 1.12

  • अमेरिका: 1.25

शीर्ष 30 शोध-प्रकाशन देशों में भारत 28वें स्थान पर है। यह चेतावनी है।

 

🌐 पढ़ें: Category Normalized Citation Impact (CNCI) क्या है?Clarivate का ब्लॉग जिसमें CNCI का महत्व और इसकी गणना का तरीका बताया गया है।

 



💸 इरादों से नहीं, निवेश से बनती है विज्ञान की शक्ति
 

अब बात करते हैं असली निवेश की — नागरिक अनुसंधान पर जीडीपी का कितना प्रतिशत खर्च होता है:

  • इज़राइल: 6.3%

  • दक्षिण कोरिया: 4.9%

  • अमेरिका: 3.46%

  • चीन: 2.4%

  • भारत: केवल 0.67%

अगर लक्ष्य “विकसित भारत 2047” है, तो इतना कम निवेश सिर्फ अपर्याप्त नहीं बल्कि भ्रामक भी है। केवल दस्तावेज़ और घोषणाएँ काफ़ी नहीं होतीं।

 

🌐 जानें: दुनियाभर में R&D पर खर्चOECD वेबसाइट पर विभिन्न देशों में जीडीपी के अनुपात में R&D खर्च का विस्तृत डेटा।

 



🧪 भारत बनाम विश्व: जर्नल प्रभाव का विश्लेषण
 

उदाहरण लें Journal of the American Chemical Society (JACS) का — यह दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित रसायन विज्ञान जर्नलों में से एक है:

  • Chinese Academy of Sciences (CAS): 444 शोध पत्र

  • भारत के सभी CSIR लैब्स: केवल 29

  • सभी IITs मिलाकर: 68 (2017–2024 के बीच)

यहाँ तक कि चीन की माध्यम श्रेणी की यूनिवर्सिटियाँ भी भारत के शीर्ष संस्थानों से अधिक और बेहतर जर्नलों में प्रकाशित कर रही हैं। जब बात आती है Impact Factor और H-Index की, तो भारत पिछड़ जाता है।
 



⚠️ नैतिकता का संकट: फर्जी जर्नल और धोखाधड़ी
 

भारत को एक और गहरी समस्या झेलनी पड़ रही है: शोध प्रकाशन में नैतिकता का अभाव और धोखाधड़ी

  • 2018 के एक अध्ययन के अनुसार, दुनिया के 62% फर्जी जर्नल भारत से प्रकाशित होते हैं

  • भारत के कुल शोध प्रकाशनों में से लगभग 10% फर्जी हो सकते हैं

  • Omics Group, जिसे 2019 में अमेरिका की FTC ने $50 मिलियन का जुर्माना लगाया, ने 69,000 जर्नल बिना उचित समीक्षा के प्रकाशित किए।

कारण? बिगड़े हुए प्रोत्साहन तंत्र। शोधकर्ताओं को गुणवत्ता की बजाय संख्या बढ़ाने पर जोर दिया जाता है।
 



🤥 भ्रम में आत्मसंतोष और संस्थागत आत्ममुग्धता
 

भारत के शीर्ष वैज्ञानिक अधिकारी लगातार भ्रम पैदा कर रहे हैं — जैसे कि यह गर्व से बताना कि भारत के 5,351 वैज्ञानिक "शीर्ष 2%" सूची में हैं, लेकिन यह नहीं बताना कि इनकी रैंकिंग 163 से लेकर 6,855,948 तक फैली हुई है।

इस प्रकार के बयान केवल सतही गर्व को बढ़ावा देते हैं और असली समस्याओं से ध्यान भटकाते हैं।

 

🌐 पढ़ें: भारत के शीर्ष 2% वैज्ञानिकों की सूची: सच्चाईStanford University का लेख, जिसमें "शीर्ष 2%" वैज्ञानिकों की सूची की पद्धति का खुलासा किया गया है।

 



🧭 आगे का रास्ता: भारत की विज्ञान व्यवस्था को सुधारना
 

  1. सरकारी विश्वविद्यालयों और लैब्स में भारी निवेश — विशेष रूप से छोटे शहरों में।

  2. प्रोत्साहनों में बदलाव — गुणवत्ता और प्रभाव को प्राथमिकता दें।

  3. फर्जी जर्नलों और नैतिकता विहीन शोध पर सख्त कार्रवाई

  4. प्रकाशनों को वैश्विक मानकों से मापें — जैसे Impact Factor और Citation Index।

  5. अंतरराष्ट्रीय सहयोग और अनुभव को बढ़ावा दें

 

🌐 जानें: वैश्विक अनुसंधान सहयोग प्रवृत्तियाँNature का लेख, जिसमें अंतरराष्ट्रीय सहयोग के फायदों पर प्रकाश डाला गया है।

 



✨ निष्कर्ष: जो गिना जा सकता है, वह जरूरी नहीं होता
 

भारत का भविष्य एक ज्ञान महाशक्ति के रूप में इस पर निर्भर करता है कि हम कितने शोध पत्र प्रकाशित करते हैं नहीं, बल्कि कितने सार्थक हैं। आइंस्टीन ने कहा था:

“हर वह चीज़ जिसे गिना जा सकता है, जरूरी नहीं कि वह मायने रखे; और हर वह चीज़ जो मायने रखती है, उसे गिना नहीं जा सकता।”

 

हमें सतही संख्याओं से बाहर निकलकर सार्थक, भरोसेमंद और परिवर्तनकारी शोध पर ध्यान देना होगा। तभी हम वास्तव में “वैज्ञानिक महाशक्ति” कहलाने के योग्य बनेंगे।

 

🌐 पढ़ें: वैज्ञानिक शोध प्रभाव का आकलन कैसे करें?Science Magazine का लेख, जिसमें शोध गुणवत्ता को मात्र संख्या से नहीं बल्कि प्रभाव से मापने की जटिलताओं पर चर्चा की गई है।

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