

दुनिया के भू-राजनीतिक नक्शे में लगातार बदलाव हो रहे हैं। खासकर भारत की भूमिका एशिया-प्रशांत क्षेत्र में पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गई है। ऐसे में “क्वॉड बनाम स्क्वॉड” की बहस भारत के लिए न सिर्फ एक कूटनीतिक परीक्षा है, बल्कि एक अवसर भी।
क्वॉड (QUAD) यानी Quadrilateral Security Dialogue एक रणनीतिक मंच है जिसमें चार लोकतांत्रिक देश शामिल हैं – भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया। इसका उद्देश्य एक स्वतंत्र, मुक्त और समावेशी इंडो-पैसिफिक क्षेत्र को सुनिश्चित करना है।
स्क्वॉड (SQUAD) एक नया उभरता हुआ समूह है, जिसमें फिलीपींस ने भारत की जगह ली थी। हालांकि, हाल की घटनाओं में फिलीपींस ने भारत से अनुरोध किया है कि वह स्क्वॉड का हिस्सा बने, जिससे यह साफ हो जाता है कि चीन के विरुद्ध एकजुटता बन रही है।
फिलीपींस के शीर्ष जनरल ने यह कहकर सनसनी फैला दी, "चीन आपका भी दुश्मन है और हमारा भी।" यह बयान साफ संकेत देता है कि फिलीपींस, भारत को एक विश्वसनीय सैन्य और रणनीतिक सहयोगी के रूप में देखता है।
इस पृष्ठभूमि में डोनाल्ड ट्रंप की "गिव एंड टेक" नीति अहम है। ट्रंप ने जापान के साथ डिफेंस ट्रीटी को “अनफेयर” बताते हुए पुनर्विचार की बात की थी। इससे फिलीपींस जैसे देशों को यह महसूस हुआ कि अमेरिका पर निर्भरता जोखिमभरी हो सकती है।
यह निर्णय भारत के लिए बेहद संवेदनशील है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में चीन के साथ “साझा विकास” की बात की थी।
यदि भारत स्क्वॉड में शामिल होता है, तो यह संदेश चीन को सीधा जाएगा कि भारत उसे रणनीतिक प्रतिद्वंद्वी मानता है – जिससे डिप्लोमैटिक असंतुलन बढ़ सकता है।
विश्लेषण कहता है कि भारत के लिए दूसरा विकल्प ज्यादा व्यावहारिक है क्योंकि इससे वह किसी भी पक्ष को नाराज़ किए बिना अपनी रणनीतिक स्थिति मजबूत कर सकता है।
भारत को अब “रीऐक्टिव नहीं, प्रोऐक्टिव” होना पड़ेगा। स्क्वॉड में शामिल होना एक शक्ति प्रदर्शन हो सकता है, लेकिन इससे पहले यह तय करना ज़रूरी है कि भारत कूटनीति से सुरक्षा चाहता है या टकराव से।
अमेरिका की बदलती नीतियां और चीन की आक्रामक रणनीति को देखते हुए भारत को अपनी विदेश नीति में दीर्घकालिक संतुलन बनाए रखना होगा।
भारत को न तो भावनाओं में बहना चाहिए, और न ही दबाव में आना चाहिए। यह समय है रणनीतिक संतुलन बनाए रखने का – न तो चीन से दूरी और न ही अमेरिका या फिलीपींस से टकराव।
क्या आपको लगता है कि भारत को स्क्वॉड जॉइन करना चाहिए? या उसे क्वॉड में रहते हुए अपनी डिप्लोमैटिक पावर को बढ़ाना चाहिए?
नीचे कमेंट करके जरूर बताएं – आपकी राय भारत की विदेश नीति के भविष्य को समझने में मददगार हो सकती है!
धन्यवाद!
जैसा कि मैं हमेशा कहता हूं –
"देश की ताकत न सिर्फ बॉर्डर पर, बल्कि डिप्लोमैसी में भी तय होती है!"
Internal SEO Boosting Tags for Link Building (Recommended for use on blog page):
कॉपीराइट 2022 ओजांक फाउंडेशन